धर्म युद्ध और कर्म युद्ध क्या हैं जानो बाबा साहेब की विचारों से

 धर्म युद्ध हो या कर्म युद्ध हो, यह दोनों अलग-अलग नहीं है यह दोनों युद्ध एक ही है। बस लोगों ने इसे अलग-अलग तरीके से परिभाषित कर रहे हैं। लेकिन दोनों का अर्थ एक ही है। ऐसा भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध के समय कहा था। 

धर्म युद्ध और कर्म युद्ध क्या हैं जानो बाबा साहेब की विचारों से


ठीक उसी प्रकार आधुनिक युग में जब बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी ने समाज में परिवर्तन के लिए समानता कायम बनाने के लिए समाज की कुर्तियां दुर्व्यवहारों से जूझ रहे थे। तब उन्होंने समाज से छुआ-छूत, भेद-भाव, उच्च - नीच, से ग्रसित समाज को एक नई दिशा देने के लिए उन्होंने समाज वालों से कहा था की धर्म युद्ध ही कर्म युद्ध होता है। 


इसीलिए धर्म और कर्म के बीच लड़ाई-झगड़ा मत करो। सब के सब अपने-अपने कर्मों पर ही ध्यान केंद्रित करके कर्म करते रहो एक दिन सफलता अवश्य मिलेगी। 


अगर धर्म और अधर्म करते रहोगे तो किसी को कुछ भी नहीं हासिल होगा। सब के सब खाली हाथ रह जाओगे। 


आइए अब हम जानते हैं भगवान श्री कृष्ण जी ने धर्म युद्ध के बारे में क्या कहते थे, अर्जुन से इसके बारे में। 


जब महाभारत का युद्ध होने जा रहा था, तब भगवान श्री कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा था कि पात्र तुम इतना व्याकुल क्यों लग रहे हो। तब अर्जुन ने बताया कि माधव मैं बहुत दुखी हूं।


क्योंकि इस युद्ध में सब के सब हमारे अपने ही हैं इसीलिए सबसे ज्यादा नुकसान हमारे अपने जनों को ही होगा। इसीलिए हमारा मन व्याकुल लग रहा है।


फिर भगवान श्री कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा कि क्या सबके लिए अपने आप को दोषी मान रहे हो। और तुम्हारा दिमाग अपने प्रिय जनों के आंसुओं पर हैं। 


तब अर्जुन ने कहा कि हां मैं अपने आप को दोषी मान रहा हूं क्योंकि वह भी हमारे अपने लोग ही हैं।


तब भगवान श्री कृष्ण जी ने कहां की तब युद्ध करने की कोई जरूरत ही नहीं है। अगर मस्तिष्क (दिमाग) पूरी तरह से अपने लक्ष्य पर ना हो, तब इतना संघर्ष करके, इतनी मेहनत करके, इतनी कोशिश करके कोई फायदा नहीं होगा। और वह काहे की तुम जाओ घर को लौट जाओ और अपने परिवार जनों की आंसू पूछो। अब तुम्हारा सपनों का कुछ नहीं हो सकता, जाओ दासी जीवन स्वीकार करो। 


तब फिर अर्जुन कहते हैं की अपने परिवार जनों की दुखी व्यक्त क्यों न करूं। 


फिर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि धर्म युद्ध या कर्म युद्ध में कोई रिश्ता नहीं होता है। जो तुम्हारा लक्ष्य है सिर्फ और सिर्फ उस लक्ष्य के बारे में सोचो। अगर भाई-बहन, पितामह, गुरु के आंसू के हिसाब करते बैठोगे, तो खाली हाथ ही रहना पड़ेगा। तुम्हे कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाएगा। 

तुम्हें चाहे जो भी लगे मगर एक बात सच है की मैं सिर्फ और सिर्फ वही कहता हूं, की एक योद्धा के लिए जरूरी है। आवश्यक है। 


अगर युधिष्ठिर को सम्राट बनना है तो जाओ और पूरी तरह से आत्म केंद्रित होकर रहो। अगर भटकोगे तो कुछ नहीं हो पाएगा । और हां पात्र एक बात याद रखना जो वात जैसे जिस तरह से पहुंचनी है। वह वैसे ही पहुंचने चाहिए। 


ठीक उसी प्रकार बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के विचार हैं। आईए जानने की कोशिश करते हैं। बाबा साहेब की विचारों से की समाज में समानता के लिए एक युद्ध की जरूरत है। जिसे समाज में समानता कायम किया जा सके। उनका कहना है की कर्म और धर्म दोनों अलग-अलग नहीं है। दोनो एक ही है, बस लोगों ने उसे अलग-अलग शब्दों में परिभाषित कर रहे हैं। सच तो ये है की कर्म ही धर्म है।


यह कथन भगवान श्री कृष्ण जी ने कहा था। ठीक उसी प्रकार बाबासाहेब भी कहते है की कर्म ही धर्म है।


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